दिल्ली अब धड़कती
नही दहलती है ।
दिल्ली अब धड़कती नही दहलती है। यह कथन आज की दिल्ली की स्थिती देखते
हुए गलत नही हो सकता । हर घंणटे,
हर रोज दहलती है दिल्ली . हर मिनट हर सेंक्ड सिसकती
है दिल्ली । हर दिन हर रात चौबीसो घंणटे अपनी बेटियो की
और अपनी बोटी बोटी नुचते देख रोती है दिल्ली। अपनी छाती
से जिन बेटो को लगाकर रखती थी दिल्ली आज उन्ही
बेहरूपी दरिंदो से उसी छाती को
बचाती मुँह छुपा रही है दिल्ली। क्या यही है वो दिल्ली जहीँ देश भर के नौजवान
कुछ
मुठ्ठी भर सपने लाकर अपने आप को
गौरवानवित महसूस करते थे। क्या यह वही दिल्ली है जहाँ लड़किया आकर अपने
पंखो को
उड़ान देती थी। क्या यही है वो दिल्ली? . क्या यही है वो सपनो का शहर? यही कुछ सवाल है जो
आज हर
एक दिल्लीवासी अपने आप से पूछ रहा, यही वो सवाल है जो दिल्ली की बेटिया
दिल्ली से पूछ रही । यही वो सवाल है
जिसका जवाब दिल्ली अपनी बची कुची अस्मिता को
बचाने के लिए ढूँढ़ रही है ।
बहरहाल दिल्ली में
लगातार बलात्कार की होती घटनांओ के कारण यह सवाल उठने लाजिमी है। दामिनी गैंगरेप
जिसने पूरी दिल्ली ही बल्की पूरे देश को हिला कर दिया । इस घटना ने हमारे मार्डन
इंडिया में रहने वाली देवी के समान पूजी जाने वाली भारताय नारी की स्थिति की कलई
खोल दी । इस घटना ने देश को यह भई बता दिया कि अभी भी हमारे अंदर क्रांतीकारी बसते
है और हम अन्याय नही सहेंगे। और साथ ही इस घटना ने हमारी सरकार की भी नीचता का बहुत
ही खूबसूरत उदाहरण दिया है । जिसने इस जग्नय अपराध के खिलाफ कोई कड़ा रुख न अपनाकर
उसे एक सियासी मुद्दा बनाया। बलात्कारी का अपना जुर्म कबूल करने के बाद भी उसे सजा
मुर्कर नही किया जाना और इस अपराध की तफतीस मे लग जाना यह सारी की सारी बाते कही न
कही हमारे पुराने और धीमे सिस्टम के बदलाव पर प्रकाश भी ड़लती है । बहरहाल इस
बलात्कार कांड़ के बाद दिल्ली और केंद्र सरकार के ढ़ीले रवैये और पुलिस की लाचारी
ने मानो लोगो के अंदर की वासना को जागृत करके एक मंच प्रदान कर
दिया है, अपनी अंदर दबी कुंठाओ और कु- इच्छाओं को समाने रखने का जिससे लोग अपने
अंदर उठती इन लहरो को दबाने की जगह इन्हे बाहर लाकर दूसरो की जिंदगी तबाह करने से
नही चूक रहे है। दिल्ली और पूरे देश में बढ़ते हुए " कारो और बसो में लगातार
बढ़ते हुए गैंगरेप " इसका जीता जागता उदाहरण है । लेकिन इस सरकार को लाने वाले भी तो हम
ही है । इस देश की गलीयारे में देहव्यापार को बढ़ावा देने वाले भी तो हम है ।
रास्ते में जाती लड़कियो को इस समाज के कुछ बहस्कृत नामो का तमगा पहनाने वाले भी
तो हम ही । और दामिनी या 5 साल की गुड़िया के बलात्कार के बाद न्याय के लिए
चिल्लाने वाले भी तो हम ही है । तो आखिर गुनहगार कौन सरकार जिसे हमने चुना अपने
होशो हवाश मे या फिर वो बाबा आजम के जमाने की न्यायपालिका, या हमारा सिस्टम, या
फिर उस बलात्कारी को जन्म देने वाली अभागी माँ । आखिर कौन? चिंतन करने पर एक ही जवाब मिलेगा कि हम, हम भी उतने ही बड़े
गुनहगार है जितने बड़े वो बलात्कारी । आखिर में नेनसी मे इतना ही कहूँगा कि यह देश
उतना तबाह दुष्टो की दुष्टता से नही , जितना सज्जने की निष्क्रियता से है ।
-अनुराग शुक्ला
- बी.जे.एमसी प्रथम वर्ष